
दुनिया के सबसे पॉवरफुल मुस्लिम देशों में से दो मुस्लिम देशों सऊदी अरब और UAE इस समय महायुद्ध लड़ रहे हैं। एक वक्त एक ही कॉमन मकसद के लिए उतरे इन सुन्नी देशों के बीच दो देश लड़ाई का मैदान में हर तरीके से पिस रहे हैं। तेल का खजाना देश यमन दोनों खाड़ी देशों की दुश्मनी की मार बुरी तरह से झेल रहा है। और तो और सूडान में इन दोनों देशों के बीच जंग छिड़ गई है। इनमें से एक देश पर पीठ में छुरा घोंपने का आरोप लगा लेकिन ये लड़ाई सिर्फ आरोपों तक ही सीमित नहीं रही है। तो क्या है ये पूरा मामला आगे जानें दो दोस्त सुन्नी देशों के बीच आखिर ये दुश्मनी हुई कैसे और तो और इसमें दुनिया का सबसे शक्तिशाली राष्ट्र अमेरिका कैसे घुस आया?
दुश्मनी की शरुआत
दरअसल शुरुआती समय में, सऊदी अरब और UAE दोनों यमन में ईरान-समर्थित हूती विद्रोहियों को नियंत्रण में लाने और उन्हें हराने के लिए एक गठबंधन बनाकर मैदान में उतरे थे, लेकिन जल्दी ही उनके असली एजेंडे एक दूसरे के सामने आ गए। सऊदी अरब इस देश में सुरक्षा और शांति लाने के लिए काम कर रहा था, सऊदी का मुख्य लक्ष्य अपने दक्षिणी बॉर्डर पर हूती खतरे को खत्म करने और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त यमनी सरकार को सत्ता में बहाल कर देना था। वहीं, दूसरी ओर UAE बदल गया और जल्दी ही अपने हितों को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया। इसका केंद्र यमन के महत्वपूर्ण दक्षिणी बंदरगाहों और तटरेखा पर नियंत्रण स्थापित करने पर शिफ्ट हो गया। वहीं UAE ने चुपके से STC जैसे दक्षिणी अलगाववादी गुटों को समर्थन देना, हथियार और और उनके प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया। सऊदी अरब को ये कदम पीठ में छूरा घोंपने की तरह महसूस हुआ। इस मामले में यह भी दावा किया गया कि UAE-समर्थित अलगाववादियों ने सऊदी-समर्थित सरकार की सेनाओं पर हमला भी किया था। इसके बाद गठबंधन के भीतर ही विश्वासघात पैदा हो गया और असली मकसद पूरी तरह बिखर गए। इस सबके बाद दो पावरफुल मुस्लिम देशों के लिए ये सिर्फ एक ‘प्रॉक्सी वॉर’ नहीं बनी, बल्कि वर्चस्व का महायुद्ध बन चुका है।
सूडान में साल 2023 में जब सेना (SAF) और RSF के बीच युद्ध छिड़ा, तो यहां भी ये दोनों देश आपस में भिड़ गए। इन मुद्दों पर सऊदी अरब शांति वार्ता का समर्थन कर रहा था, लेकिन UAE कथित तौर पर RSF को हथियारों और फंड से मदद कर रहा है, जिससे दारफुर में भयावह नरसंहार हो रहा है।
MBS इसी साल जब अमेरिका गए थे तब उन्होंने UAE की शिकायत ट्रंप से की थी। उन्होंने अमेरिका से सूडान में पैरामिलिट्री रैपिड सपोर्ट फोर्सेज की मदद मांगी थी। इस शिकायत के बाद UAE के साथ सऊदी अरब के रिश्ते और गहरी तरीके से बिगड़ गए।
एकोनॉमी वॉर
इन सब घटनाओं के बाद यह दुश्मनी सिर्फ युद्ध के मैदान तक ही सीमित नहीं है, बल्कि पैसों की ताकत को लेकर भी हो रही है। सऊदी अरब अब दुबई को क्षेत्रीय व्यापार केंद्र के रूप में चुनौती दे रहा है। सऊदी के MBS ने विदेशी कंपनियों के लिए एक नियम लागू कर दिया है कि वे अपने क्षेत्रीय मुख्यालय को दुबई या अबू धाबी से हटाकर रियाद लेकर आए, इस कदम से अरबों डॉलर की इनवेस्टमेंट सऊदी से छिन जाएगी।
कैसे घुसा अमेरिका?
अपनी पुरानी आदतों से परेशान अमेरिका इस जंग में भी घुस आया। अमेरिका की इस भूमिका का मुख्य कारण खाड़ी क्षेत्र में ईरान के प्रभाव को खत्म करना था। अमेरिका और सऊदी दोनों ईरान-समर्थित हूतियों को एक सम्मिलित खतरा मानते थे। अमेरिका सऊदी गठबंधन को अरबों डॉलरों के हथियार हमेशा से बेचता रहा है, जिनका इस्तेमाल यमन में हवाई हमलों के लिए भी किया गया है। इस हथियार बिक्री ने सऊदी के सैन्य प्रोग्राम को भी लंबे समय तक जारी रखने में मदद की थी। वैसे भी अमेरिका सीधे बमबारी नहीं कर रहा था, लेकिन उसने सऊदी गठबंधन को वह शक्ति और संसाधन प्रदान किए, जिसके दम पर यह युद्ध इतने वर्षों तक चलता रह गया।



