श्रीनगर: जम्मू-कश्मीर की राजनीति में एक बार फिर क्षेत्रीय पुनर्गठन की बहस तेज हो गई है। पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP) ने जम्मू संभाग की भौगोलिक और प्रशासनिक संरचना में बड़े बदलाव की मांग करते हुए विधानसभा में एक ‘निजी सदस्य विधेयक’ (Private Member Bill) पेश किया है। इस प्रस्ताव के केंद्र में जम्मू प्रांत को तीन अलग-अलग प्रशासनिक हिस्सों में विभाजित करने की योजना है।
क्या है पीडीपी का ‘त्रि-विभाजन’ फॉर्मूला?
महबूबा मुफ्ती के नेतृत्व वाली पीडीपी का तर्क है कि जम्मू संभाग का वर्तमान स्वरूप इतना विशाल और भौगोलिक रूप से जटिल है कि दूरदराज के इलाकों तक विकास की किरण नहीं पहुँच पा रही है। पार्टी ने विधानसभा में पेश किए गए अपने बिल में जम्मू को तीन स्वायत्त प्रांतों में बांटने का प्रस्ताव दिया है:
- चिनाब प्रांत: इसमें रामबन, डोडा और किश्तवाड़ जिलों को शामिल करने का सुझाव है।
- पीर पंजाल प्रांत: इसमें राजौरी और पुंछ जिलों को मिलाकर एक नया प्रशासनिक ढांचा तैयार करने की मांग है।
- जम्मू प्रांत: शेष जिले वर्तमान जम्मू प्रांत का हिस्सा बने रहेंगे।
प्रस्ताव के पीछे पीडीपी के तर्क
विधेयक पेश करते हुए पीडीपी के विधायकों ने तर्क दिया कि चिनाब घाटी और पीर पंजाल के इलाके दशकों से उपेक्षा का शिकार रहे हैं। जम्मू मुख्यालय से इन क्षेत्रों की दूरी और कठिन पहाड़ी रास्ता प्रशासनिक कार्यों में बड़ी बाधा बनता है। पार्टी का मानना है कि अलग प्रांत बनने से:
- इन दुर्गम क्षेत्रों को अपना बजट और प्रशासनिक केंद्र (Secretariat) मिलेगा।
- स्थानीय संस्कृति और भाषाओं (जैसे डोगरी के साथ-साथ गोजरी, पहाड़ी और कश्मीरी) का संरक्षण बेहतर हो सकेगा।
- रोजगार और बुनियादी ढांचे के विकास में तेजी आएगी।
राजनीतिक गलियारों में हलचल
पीडीपी के इस कदम ने जम्मू-कश्मीर की सियासत में हलचल पैदा कर दी है। जहाँ कश्मीर केंद्रित कुछ दल इसे “क्षेत्रीय पहचान” की मजबूती के रूप में देख रहे हैं, वहीं भाजपा (BJP) और कई अन्य संगठनों ने इसकी आलोचना शुरू कर दी है। आलोचकों का कहना है कि यह प्रस्ताव जम्मू की एकता को खंडित करने और समुदायों के बीच विभाजन पैदा करने की एक कोशिश हो सकती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2019 में अनुच्छेद 370 हटने के बाद यह पहली बार है जब किसी क्षेत्रीय दल ने इतने बड़े स्तर पर पुनर्गठन का मुद्दा विधानसभा के पटल पर रखा है।
निष्कर्ष
फिलहाल यह एक निजी सदस्य बिल है, जिसे पारित कराना पीडीपी के लिए एक बड़ी चुनौती होगी, क्योंकि सदन में संख्या बल और अन्य दलों का रुख अभी स्पष्ट नहीं है। लेकिन इस बिल ने यह जरूर साफ कर दिया है कि जम्मू-कश्मीर की राजनीति अब सिर्फ ‘विशेष दर्जे’ तक सीमित नहीं है, बल्कि अब आंतरिक सीमाओं और प्रशासनिक विकेंद्रीकरण पर भी आर-पार की जंग शुरू हो चुकी है।



