श्रेया मेहरोत्रा: गुजरात के सूरत में Lenskart को लेकर उठा विवाद अचानक राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गया है। सोशल मीडिया पर वायरल हुए कुछ वीडियो और दावों के बाद कंपनी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन देखने को मिले। आरोप लगाया गया कि नौकरी या ट्रेनिंग के दौरान धार्मिक प्रतीकों जैसे तिलक और शिखा को लेकर आपत्ति जताई गई, जिसके बाद लोगों में नाराज़गी बढ़ गई।
इस पूरे मामले ने व्यापार, धार्मिक स्वतंत्रता और कॉर्पोरेट नीतियों पर नई बहस छेड़ दी है।हालांकि, कंपनी की ओर से इन दावों को लेकर सफाई भी सामने आई है। Lenskart प्रबंधन ने कहा कि सोशल मीडिया पर चल रही कई बातें गलत तरीके से पेश की जा रही हैं और कंपनी किसी भी धर्म या समुदाय के खिलाफ भेदभाव नहीं करती। कंपनी का कहना है कि उनकी नीतियां सभी कर्मचारियों के लिए समान हैं और कार्यस्थल पर सम्मानजनक माहौल बनाए रखना उनकी प्राथमिकता है।
दूसरी ओर, विरोध कर रहे लोगों का कहना है कि यदि किसी कर्मचारी या उम्मीदवार को उसकी धार्मिक पहचान के कारण रोका गया है, तो यह स्वीकार्य नहीं है। सूरत में कुछ स्थानों पर प्रदर्शन हुए, नारेबाजी हुई और गुस्सा खुलकर सामने आया। इससे यह मुद्दा स्थानीय स्तर से निकलकर राष्ट्रीय स्तर की बहस बन गया।यह विवाद दिखाता है कि आज के दौर में सोशल मीडिया किसी भी मामले को कितनी तेजी से बड़ा बना सकता है। कुछ घंटों में एक स्थानीय घटना देशभर में चर्चा का विषय बन जाती है।
ऐसे मामलों में सही तथ्य सामने आने से पहले ही जनमत बनना शुरू हो जाता है, जिससे कंपनियों और प्रशासन दोनों पर दबाव बढ़ता है।Lenskart विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि क्या कॉर्पोरेट नियम और व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाना आसान है? आने वाले दिनों में कंपनी, प्रशासन और समाज की प्रतिक्रिया तय करेगी कि यह मामला शांत होता है या और बड़ा राजनीतिक-सामाजिक मुद्दा बनता है।



